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Synopsis
आधुनिक समय में भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में एक आत्मनिर्भर देश
बन चुका है। 21वीं सदी के प्रारम्भ से ही हमारे देश में आधुनिक
तकनीक का प्रयोग करके फसल तुड़ाई उपरान्त प्राप्त उत्पादों के
संरक्षण व प्रसंस्करण पर काफी ध्यान दिया गया है। बदलते परिवेश के
साथ औद्यानिकी फसल सिर्फ जीविका निर्वाह के साधन मात्र नहीं रह
गये हैं अपितु ये व्यापक रोजगार सृजन के माध्यम भी बन गये है।
आज यह क्षे़त्र द्रुतगति से बढ़ता हुआ एक संगठित उद्योग का रूप ले
चुका है। औद्यानिकी फसल न केवल हमारे स्वाद में बढ़ोत्तरी करते हैं
अपितु इनके माध्यम से हमारे शरीर को आवश्यक विटामिन, खाद्यरेशे
व्छस्ल् थ्व्त् च्त्व्व्थ्
एवं खनिज लवणों की आपूर्ति भी सुनिश्चित होती है। भारत जैसे
विभिन्न जलवायु वाले देश में अलग-अलग स्थानों पर भिन्न-भिन्न
मौसम में इन स्वादिष्ट फलों एवं सब्जियों की खेती करके कृषक परिवार
अपनी आय में वृद्धि तो करते ही हैं साथ ही वे सभी को स्वास्थ्य सुरक्षा
भी प्रदान करते हैं। चूँकि औद्यानिकी फसलों की पैदावार बहुत कुछ
मौसम पर निर्भर रहती है। अतः अधिक पैदावार की दशा में हम इन्हें
बहुत दिन तक सुरक्षित रख नहीं सकते। उचित भण्डारण कृषकों के
समक्ष एक बहुत बड़ी समस्या है। औद्यानिकी फसल शीघ्र नष्ट होने
वाले उत्पाद हैं अतः अधिक उत्पादन की स्थिति में इनका परिरक्षण एवं
प्रसंस्करण अति आवश्यक हो जाता है। आज के दिन कुल औद्यानिकी
फसल उत्पादन का लगभग 2 प्रतिशत भाग ही प्रसंस्कृत हो पाता है।
औद्यानिकी फसलों का प्रसंस्करण बहुत कुछ ठोस वैज्ञानिक
अनुसंधान व प्रौद्योगिकी के प्रयोग पर आश्रित है। हमारे देश की यह
प्राचीन विद्या अब अनुभव, क्रमिक विकास तथा वैज्ञानिक शोध द्वारा एक1
औद्यानिकी फसल प्रसंस्करण एवं ग्रामीण महिला सशक्तिकरण
नया आयाम एवं आकार ले चुकी है। यह विधा विज्ञान एवं कला का
एक सार्थक सम्म्श्रिण है। औद्यानिकी फसलों जैसे जीवित खाद्य पदार्थों
को विभिन्न विधियों द्वारा संरक्षित कर लागत एवं लाभ के अनुपात को
बढ़ाया जा सकता है एवं बिना मौसम उपयोग किया जा सकता है।
औद्यानिकी फसलों में फल एवं सब्जियों की जो रासायनिक संरचना
होती है उसमें संसाधन द्वारा अनुकूल परिवर्तन करके सूक्ष्मजीवों के
आक्रमण को अवरूद्ध कर दिया जाता है। या एन्जाइम की क्रिया को
निष्क्रिय कर परिरक्षण किया जाता है।
References
